Framing has lost the abiltiy to be a source of susistence for majority of Farmers in India. भारत में अधिकतर कृषकों के लिए कृषि जीवन -निर्वाह एक सक्षम स्रोत नहीं रही है।

                                                                   निबंध-२ भाग -१
                    भारत में अधिकतर कृषकों के लिए कृषि जीवन -निर्वाह एक सक्षम स्रोत नहीं रही है।

भारत देश में जैसे-जैसे बाजार जैसी व्यवस्था ने जन्म लिया है , लोगो, किसानो  का विचार धनकोष की ओर केंद्रित हो रहा है , लोगो का रुझान कृषि -कर्म न होकर इससे संबंधित आर्थिक उपार्जन की ओर हो  रहा है। किसानो का यह नैतिक पतन पूंजीवाद का बाजार  में प्रवेश  कारण हो गया है , किसान धीरे - धीरे आत्मकेंद्रित होते  जा रहे है और उनका कृषीय क्रिया -कलाप से मोहभंग हो रहा है।

वर्तमान में भारत का बाजारीकरण वैश्विक हो गया है , सरकार का ध्येय कृषको की आय को २०२२ तक दुगुना करना है।  यक्ष प्रश्न यह है कि सरकार किन मानकों को ध्यान में रखकर किसानो  आय दुगुना करेगी , इसके लिए किसानो  वर्तमान आय रेखीय आय को समझना होगा ,जहां कुछ किसानो की वार्षिक  आय बनिस्पत रु २४,००० है तो वही कुछ किसानो की रु करोङो में है , इन आय -व्यय अंतर को समझना होगा। जहाँ कुछ किसान कर योग्य आय की सीमा से कोंसो दूर हैं तो वहीँ कुछ किसानो की लाखो - करोङो की आय होकर भी , किसान होने के कारण कर छूट लाभ प्राप्त कर रहें हैं , तो  किसानो में इस प्रकार कई वर्ग बन गया है।  इसमें सोचने समझने की बात है कि कौन -किस वर्ग का किसान अपने आने वाली पीढ़ी को इस वंशानुगत पेशे में नहीं लगाना चाहेगा , एक गरीब किसान या फिर समृद्ध किसान।

गरीब किसान की आय का विश्लेषण करने के पश्चात यह निर्कर्ष निकालता है कि उसके  परिवार की सकल आय का इतनी कम है की एक व्यक्ति के मनरेगा के एक वर्ष के आय के  बराबर से भी कम  है , ज्ञात हो कि सरकार पलायन व बेरोजगारी की समस्या से निजात पाने के लिए ग्रमीण परिवार के एक  सदस्य को १०० दिन का रोजगार देने की गारंटी दी गई है।

जिस किसान की प्रतिदिन आय  सरकार द्वारा निर्धारित दैनिक मजदूरी से कम हो , जिस आय से व्यक्ति अपने परिवार का भरण- पोषण , शिक्षा -चिकित्सा जैसे रोजमर्रा की आवश्यकता की पूर्ति कृषीय आय से पूरा करने में सक्षम न हो , वह क्यों और आने वाली पीढ़ी को इस रोजगार में लगाना चाहेगा।  समस्या तो इतनी विकराल हो गई है  कि सरकार ने जैसे - जैसे मनरेगा कार्यक्रम को गांव - गांव तक पहुंचाया है तो लोगो के पास सरकारी मुद्रा का प्रवेशन हुआ है तो इससे जहाँ  कुछ लोगो को लाभ हुआ है तो दूसरी ओर  इस योजना ने किसानो के कुटीर उद्दोगों जैसे - कुहार के , पत्ते बुनने वाले या फिर मुसहारो व फिर खेत में काम करने वाले कृषीय मजदूरों को प्रभावित किया है।

अब कृषीय मजदूर समनता के आधार पर मनरेगा से कम कीमत पर खेतो में काम करने को तैयार नहीं हैं , वे कृषीय मजदूर कहते हैं कि मनरेगा में १०० दिन के रोजगार से जितनी आय होती है उतनी आय गांव के खेतों में  ३६५ दिन काम कर के होती है तो इस प्रकार द्विधारिता के कारण कृषि - श्रमिक खेतों में काम करना बंद कर देते हैं। कृषि - श्रमिक अब या तो मनरेगा की बाट जोहते हैं या फिर वह श्रमिक मजदूर बनकर शहरों में काम करने के लालायित हुए हैं क्योंकि शहरों में श्रमिक मजदूरी की आय अच्छी - खासी है जो कि रु ५०० से लेकर रु १००० तक है।

ऐसी स्थिति में किसान भू -मालिक के खेत खाली पड़े रह जाते हैं क्योंकि उचित श्रम - मूल्य पर काम करने वाले कृषक नहीं मिलते हैं , जो मिलते भी हैं तो वह मजबूरी बस काम करते है , जिनको मनरेगा में काम नहीं मिला या शहर में प्रवेश करने का कोई माध्यम नहीं प्राप्त हुआ।  वे चिर - परिचित अंदाज में जबाब देते हैं कि गांव की किसानी - मजदूरी लाख टके की मुद्रा शहर में काम करने से अच्छा है।

अब -जब प्रधानमंत्री का सपना डिजिटल - प्रौद्यौगिकी को घर- घर पहुँचाना है तो एक चुनौती भरा लक्ष्य सारगर्भित होता है।  संचार  माध्यम की पहुंच ने ग्रामीण - जुड़ाव को बढ़ा  दिया है।  ग्रामीण परिवेश में रहने वाली नवीन पीढ़ी के लोगों ने अपने वर्तमान को क्षेत्रीय - राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्थापित किया है।  आज वहां के लोग क्षेत्र - परिक्षेत्र के आम -जन , सोशल -मीडिया , व्हाट्सप , फेसबुक , युटुब से जुड़ गए हैं और वह अपना अधिकांश समय खेती में काम करने , बैलो को चारा देने तथा खेलने से अधिक सोशल-मीडिआ पर अपना समय व्यतीत करता है।  अब वह एक ग्रुप के माध्यम से अपने विचारों को आभासी पटल पर रखकर , आभासी मंच पर साझा करता है तथा अपने द्वारा रखे गए तथ्य पर , लेख पर लोगो के विचारो को जानना चाहता है तथा अपने विचारो को दूसरे से कहता है।

खेतों में काम करने वाले किसान , अपने चारो तरफ होने वाली क्रिया - कलाओं से प्रभावित होतें हैं , वे कहते की आय से खुद को अपने परिवार का भरण - पोषण में सक्षम पातें हैं लेकिन इसके अलावा वे अपने बच्चों को शिक्षित - प्रशक्षित भी करना चाहते हैं और उनका अपना सपना होता  कि उनका बच्चा पढ़ -लिखकर कोई बड़ा आदमी  सके ,  जिससे उनके  की गरीबी दूर हो सके क्योंकि किसान भी अब साइकिल से मोटरसाइकिल से लेकर कार सपना रखने लगा है।  वह चाहता है कि उसके पास कार हो , वाई - फाई हो , ४ जी, जैसे नेटवर्क की व्यवस्था हो।

जाहिर सी बात है कि इन सब आवश्यकता की पूर्ति हेतु उसे आय के अन्य साधनो की आवश्यकता होती है जिसको कृषीय आय से पूरा नहीं किया जा सकता।  अतः वह दिन - प्रतिदिन पलायनवादी होता चला जा रहा है। अब उसे ऐसे रोजगार  की तलाश है जो उसकी दैनिक अवाश्य्कताओ की पूर्ति कर सके , साथ ही साथ चिकित्सा - शिक्षा की भी सुविधा उस सरलतम ढंग से प्राप्त हो।  यह ऐसा नवीनतम व दीर्घजीवी विषय है जो की किसानों  को  नवीन चुनौती से लोहा लेने के लिए तैयार करता है।

हालाँकि सरकार कृषि का वाणिज्यीकरण कर रही है , खाद्यप्रसंकरण , दुग्ध - प्रसंस्करण तथा मत्स्य - प्रंस्करण को बढ़ावा दे रही है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतः शीतगृह का विकास कर रही है जिससे कृषीय उत्पादों को अधिक समय तक धारणीय बनाया जा सके और कृषकों को लक्षित आय मिल सके।

बदलते मौसम , पर्यावरण संकट ने कृषि कार्य - कलाप को प्रभावित किया है , कभी अल्प - वृष्ट्रि , ओलावृष्ट्रि फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं तो कभी - कभी अधिक धुप के कारण फ़सलें सुख जाती है।  यह सब एल -नीना , ला -नीना के कारण भी होता है जो की मौसम के पर्यांवरणीय प्रभाव पर असर डालता है। इन सबके विपरीत प्रभाव के कारण किसानो को फसलों पर दीर्घकालीन नुकसान लक्षित होता है , जिससे कृषकों की आय प्रभावित होती है और वह न चाहते हुए भी , कृषीय - कर्म जैसे कार्यो को शनैः - शनैः छोङने के लिया मजबूर होता है क्योंकि कहीं न कहीं से उसे यह आभास होता है कि खेती घाटे का सौदा बन गयी है।

अंत में कक्षा ४ की चंद पंक्तिया याद आती है जो किसान की परिभाषा तय करती है "दुख से डरता कब है किसान "

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